जुल्म

 # *ज़ुल्म*  #

मासूम फिलिस्तीनियों पर ज़्यादतियां करने वाले,

अंजाम क्या होगा तेरा ये याद कर लेना कभी ।

मस्जिद ए अक़्सा में दहशतगर्दीयां करने वाले,

अंजाम क्या होगा तेरा ये याद कर लेना कभी ।

ज़ुल्म जैसा भी हो पल नहीं सकता कभी,

दौर जालिम का चल नहीं सकता कभी ।

इंतजार कर तू अपने अंजाम पर आ जाएगा,

ज़ुल्म जो तेरा है सब खाक में मिल जाएगा ।

सोचता है क्या तेरे पास है ताकत सभी,

जिस पे चाहे जुल्म कर ले तुझ को इजाज़त है सभी ।

दौर क्या फिरऔन का तेरे तसव्वुर से गया,

क्या हुआ शद्दाद का है ईल्म इसका तुझको ज़रा ।

लूत की जो कौम थी कैसे फना वो हो गई,

समूद की जो कौम थी किस बेबसी में सो गई ।

जो इस फ़ानी दुनिया में मगरूर बन कर रहा,

तारीख गवाह है ना हो पाया उसका भला ।

चार दिन की जिंदगी है इस पर इतराता है क्या,

मौत जब आएगी तो पूछेंगे तेरा हाल क्या ।

अब भी तू बाज़ आजा छोड़ दे इस जुल्म को,

शायद रहबरी के लिए खुदा भेज दे किसी नूर को ।

....🖋️ फरहाना, चंडीगढ़

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