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मैं तेरा उम्मती

 *मैं तेरा उम्मती*  ए खुदा के मेरे  महबूब ए रसूल तुझ को मेरा सलाम  मैं हूं तुझ पे कुर्बान  तू मेरा है नबी  मैं तेरा उम्मती मैं तेरा उम्मती  मैं तेरा उम्मती ये तो दुनिया  अंधेरों में डूबी थी बस हर तरफ जुल्म का दौड़ दौरा ही था बुत खुदा बन गए कुफ्र पलने लगा दुनिया से इंसाफ  जेसे मरने लगा  कहीं जुल्मों सितम कहीं थी सिसकियां  कहीं इंसानियत की  उठ रही थी आरथियां कोई बेबस बड़ा  कोई बेखौफ था  हर तरफ जुल्म का  एक अजब दौर था  आप की आमद से  हर शय बदलने लगी दिल में इंसानियत  फिर चमकने लगी  जिसने देखा  वो शैदा हुआ आप पर  ककंरो पत्थरों  ने भी कलमा पढ़ा ए खुदा के मेरे  महबूब ए रसूल  तुझ को मेरा सलाम  मैं हूं तुझ पर कुर्बान  तू मेरा है नबी  मैं तेरा उम्मती  मैं तेरा उम्मती  मैं तेरा उम्मती      🖋️ फरहाना

Manzil

 *मंज़िल*  कितनी बार मुझको तुम, रौंदोगे ठुकराओगे.... कब तलक ऐ मेरी मंजिल, दूर मुझसे जाओगे.... रोज़ ही मैं सोचती हूं, क्यों ये धोखे खा रही हूं .... आखिर अपने प्यास को, क्यों मिटा नहीं पा रही हूं .... क्या एक चींटी से भी, कमजोर मेरा आत्मबल है ..... या फिर हारने के, डर से मैं घबरा रही हूं..... मेरे अपनों की मुझ पर, है उम्मीदें बड़ी... इसलिए अपनी काबिलियत को, घिस घिस चमका रही हूं .... रह जाएगी एक खलिश, जो पा न सकी मैं तुझको तो ..... फिर मैं अपनी आस की ये, लौ को क्यों बुझा रही हूं ..... छोड़ हर निराशाओं को, फिर हुई तैयार मैं....  ऐ मेरी मंजिल मैं तुझको, पाने आ रही हूं....                        🖋️...... फरहाना....