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Showing posts from June, 2022

अपने जुल्म को इस्लाम का नाम ना दो

 *अपने जुल्म को इस्लाम का नाम ना दो*  इस्लाम नाम है मोहब्बत का  जिंदगी जीने का जीने देने का  इस्लाम मोहब्बत ही बस सिखाता है पड़ोसी भूखा है तो गुनहगार तुम्हें बताता है  इस्लाम के नाम कत्ल करने वाले  तुमने इस्लाम को जाना ही नहीं  नबी का दम भरने वाले  नबी को तुमने पहचाना ही नहीं  वो तो दुनिया में आए रहमते लेकर उनकी तो शान ही निराली थी  वो तो मिल्लत का दर्श देते थे  कमजोर का हाथ थाम लेते थे  लाख जुल्म सहकर भी  जालिमों को दुआएं देते थे  तुम एक कमजोर पर जुल्म कर रहे और इस्लाम का दम भर रहे  तुम इंसान तो बन ना सके  और इंसाफ की बात कर रहे          🖋️...... फरहाना

फरियाद

 फरियाद सच बोलना जुल्म हो गया उस मस्ताने का  ऐ खुदा क्या हाल हो गया इस जमाने का  कब तलक के जालिमों को छूट होगी  दे दे अब तो साथ हम दीवानों का रोज नहीं साजिशें लेकर चला है काफिला ये इंसानुमा हैवाहनों का  कब तलक के यूं ही चलता जाएगा सिलसिला ये बेइंसाफ सियासतदानों का  है यकीनन तेरी कुदरत हर तरफ  मुंह काला कर दे अब तो शैतानों का      🖋️...... फरहाना

इंसाफ

 *इंसाफ*  इंसाफ कब तक न मिलेगा आखिर जब तलक के खुदा ने हाथ में तेरे ताकत बक्शी  बेगुनाह का खून तो मांगेगा अपने जुल्म का बदला औरतों की आबरू क्या फरियाद ना करेगी रब से जो जुल्म हुए बच्चों पर तेरे इशारों से उनके आंसू तेरी हस्ती को डूबोएंगे नहीं आज इतरा के तू चल ले तुझे है ढील  मिली कल जब ले लेगा तुझसे वो ताकत अपनी  तो चकरा के तू कहीं ढह जाएंगा तेरी तो मौत पर भी किसी को अफसोस ना आएगा इंसाफ कब तक ना मिलेगा आखिर जब तलक के खुदा ने हाथ में तेरे ताकत बक्शी वो फिरौन जो समझता था खुद को दुनिया का खुदा वो कारून जिसे खजाने पर अपने था नाज़ बड़ा वो शद्दाद कि जिसने खुदा से बगावत की थी आज है कहां दुनिया में वो जो कल थे मगरूर बड़े खुदा ने एक ज़रा जो अपनी कस्सी डोरी सब औंधे मुंह गिर पड़े दुनिया में इतराने वाले इंसाफ कब तक ना मिलेगा आख़िर जब तलक ए खुदा ने हाथ में तेरी ताकत बक्शी    🖋️..... फरहाना

अब्बा

 *अब्बा*  दिल दर्पण और स्नेह भरा मन मीठी बोली अब्बा की  लंबी दाढ़ी सूरत प्यारी हाथ में तस्बीह अब्बा की  घर की शान अम्मी की जान हमारा अभिमान तो अब्बा थे सबसे सच्चे सबसे अच्छे हमारे प्यारे अब्बा थे  सब खानदान को जोड़ कर रखा अपने प्यार की डोरी से  टूटने ना दी कड़ियां कोई गर्म सर्द बोली से  जरूरत पड़ी जिसको मदद की चुपचाप मदद वो करते थे  ना बतलाते ना जतलाते ऐसे मेरे अब्बा थे  जीवन सारा संघर्ष भरा पर होटों पर मुस्कान थी  मेरे अब्बा की बड़ी अनूठी बड़ी अलग पहचान थी  कभी आदर्श कभी रहबर कभी दोस्त बन जाते थे  हर रूप में हर रंग में दिल को बड़ा वो भाते थे  शादी ब्याह या दुख सुख हो अब्बा की शिरकत होती थी  उनके बिना तो हर खुशी बस सुनी सुनी होती थी  क्या बतलाऊं क्या जतलाऊं कैसे मेरे अब्बा थे  बड़े गुणी और बड़े ज्ञानी बड़े ही खास अब्बा थे            🖋️ फरहाना

गंगा तुम बहती रहना

 *गंगा तुम बहती रहना*  गंगा तुम बहती रहना  अपना शीतल जल हमें  यूं ही सदा देती रहना  गंगा तुम बहती रहना  देश मेरा किसानों का है  विद्वानों, बलिदानों का है  इस देश की मिट्टी में अपने  जल से जीवन भरती रहना  गंगा तुम बहती रहना  उत्तर से आती हो तुम  पूरब तक जाती हो तुम  जाने कितने जीवों की  प्यास को बुझाती हो तुम  हमारे जीवन में तुम अपना  मीठा जल भरती रहना  गंगा तुम बहती रहना  ना कोई तुझ में भेदभाव  ना कोई तुझ में ईर्ष्या है  निस्वार्थ से सब को पाल रही  हम सबके लिए ये शिक्षा है  अपने इसी रूप से हमारा  जीवन यापन करती रहना  गंगा तुम बहती रहना        🖋️.... फरहाना

बेअसत

 बेअसत जब स्याह अंधेरा फैला था  हर और जुल्मत का पहरा था  जब जालिम पूजे जाते थे  और गरीब लुटे जाते थे  जब औरत की ना कोई इज्जत थी  बस मर्दों की ही वुकअत थी  जब बाप इज्जत की खातिर  अपनी बेटी को जिंदा दफनाता  जब गरीब और लाचारओं की  कोई मदद को ना आता  जब गुलाम की जान का हक भी उसके मालिक के हाथ में होता था जब झूठ ,डकैत और धोखेबाजी इंसान का जौहर कहलाता  हर ओर अंधेरा छाया था  हर ओर तबाही फैली थी  तब रेगिस्तान के एक गलियारे में  एक मर्दे मोमिन आया था  गुलाम, गरीब और बेबस को  अपने सीने से लगाया था  अमीर गरीब का भेदभाव  जिसने जड़ से मिटाया था  गुलाम हफसी को भी जिसने  तख्त पर बिठाया था  औरत को इज्जत देकर जिसने  घर की मलिका बनवाया था  बेटी की आमद को जिसने  रब की रहमत करवाया था  हर बुराई जिसके आने से  खत्म हुई जमाने से  वह मर्दे मोमिन मेरा रहबर है  इस दुनिया का पैगंबर है  इस दुनिया का पैगंबर है

हाय मेरे मुल्क का क्या हाल हो गया

 *हाय मेरे मुल्क का क्या हाल हो गया*  इंसान यहां अब शैतान हो गया  जुल्म सितम भी सरेआम हो गया  हक़ की बात करना भी दुश्वार हो गया हाय मेरे मुल्क का क्या हाल हो गया....२ एक तबके पर ज्यादती एक तबके को छूट  कैसी तेरी रणनीति ये कैसा करतूत ज़ालिम यहां साधु बेकसूर गुनहगार हो गया  हाय मेरे मुल्क का क्या हाल हो गया....२ नफरत में डूबे हुए दलाल बैठे हैं  बोली लगाने जानो की सरकार बैठे हैं झूठ फैलाना मीडिया का व्यापार हो गया  हाय मेरे मुल्क का क्या हाल हो गया....२ रोज नहीं साज़िशे रोज नया झूठ  दोनों हाथों से साहिब रहे जनता को लूट  इंसाफ यहां सत्ता का दलाल हो गया हाय मेरे मुल्क का क्या हाल हो गया....२       🖋️..... फरहाना

या रसूल अल्लाह

 दिल से आती एक सदा लब्बाईक या रसूल अल्लाह या रसूल अल्लाह  शान आपकी सबसे जुदा लब्बाईक या रसूल अल्लाह या रसूल अल्लाह  दिल से आती एक सदा लब्बाईक या रसूल अल्लाह या रसूल अल्लाह  मेरी तो पहचान आप है जान आप है ईमान आप है कुर्बान मेरा सब आप पर ऐ हबीब- ए- खुदा  या रसूल अल्लाह या रसूल अल्लाह दिल से आती एक सदा लब्बाईक या रसूल अल्लाह या रसूल अल्लाह आपने हमको जीना सिखाया  खुदा से हमको है मिलवाया  आपसा ना कोई इस जहां में आया  या रसूल अल्लाह या रसूल अल्लाह दिल से आती एक सदा लब्बाईक या रसूल अल्लाह या रसूल अल्लाह आपके नाम पर जीते हैं हम  आप की खातिर मर जाएंगे  गुस्ताखी आपकी शान में हो  इस बात को हम नहीं सह पाएंगे  या रसूल अल्लाह या रसूल अल्लाह दिल से आती एक सदा लब्बाईक या रसूल अल्लाह या रसूल अल्लाह ताऐफ मे ज़ख्म आपने खाया  मक्के वालों ने जुल्मों सितम आप पे ढाया  फिर भी सभी ने आपसे शफकत मोहब्बत ही पाया  या रसूल अल्लाह या रसूल अल्लाह दिल से आती एक सदा लब्बैक या रसूल अल्लाह या रसूल अल्लाह             ...

प्रकृतिक को सहेजो

 *प्रकृति को सहेजो*  आज जागरूक न हुए तो कल पछताओगे  अपनी बेबसी से कैसे निकल पाओगे प्रदूषण तेजी से फैलता जा रहा हर तरफ  हवा में जहर सांस लेना भी दुर्लभ है अब  ना सग खाना रहेगा ना पानी कोई  तो जिंदगी में भी ना होगी रवानी कोई इन्हें जानो और सोचो विस्तार में प्रकृति को सहेजो तुम हर हाल में  आज पानी नहीं सूखी पड़ी है ज़मीं  क्या नजर नहीं आती अपनी कमी  ईट के जंगल ही हर तरफ नजर आते हैं  उन हरियाली की जगह हम इन्हें खड़ा पाते हैं  रोज नई परेशानी से हम टकराते हैं फिर भी चिंता ना इसकी हम कर पाते हैं  आज सजग न हुए तो  भविष्य डूब जाएगा अंधकार में  प्रकृतिक को सहेजो तुम हर हाल में ये नदियां ,ये पर्वत , ये जंगल, पवन इनसे मिलकर बना है हमारा ये तन इनके बिना एक पल भी ना जी पाएंगे  साथ इनके ही हम उन्नति पाएंगे  इन्हें संजोओ, सवारों मिलकर सब साथ में  प्रकृतिक को सहेजो तुम हर हाल में         🖋️..... फरहाना

कौन कहता है

 कौन कहता है ? वक्त का गर्द धुंधला देती है सारी यादों को  कौन कहता है ? वक्त ऐसा मरहम है मिटा देती है सारे जख्मों को  कुछ ऐसे भी यादें होती है जनाब  जिन पर कुछ भी रवा नहीं होती  कुछ ऐसे भी ज़ख्म होते हैं जनाब जिसकी कोई दवा नहीं होती        🖋️..... फरहाना