काली बदली

 काली बदली 


गर्मी में तप रहा है इंसाफ, काली बदली छाने दो 


आने दो आने दो काली बदली छाने दो


कूलर पंखे में बैठ बैठ कर, थक गए हैं हम बच्चे 

गर्मी में खेलकूद भी ,नहीं लगते हमको अच्छे 

गर्मी की इस गर्म हवा से, जान हमारी छुड़ाने दो 


आने दो आने दो काली बदली छाने दो


सोच सोच कर गुम हो गए ,कब बरखा रानी आएगी 

गुमड गुमड कर कब वह हमको, ढोलक की थाप सुनाएगी 

ठंडी हवा और बरखा की, फुहार से मन को जरा बहलाने दो 


आने दो आने दो काली बदली छाने दो


छोटी कश्ती कागज की ,कब पानी में बहाएंगे 

अम्मा के हाथों के बने, फिर गरम पकोड़े खाएंगे 

और ना हम से दूर रहो बस ,और ना हमको तरसाए 


आने दो आने दो काली बदली छाने दो।    

                                 🖋️.... फरहान....



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