ज़मीर की ललकार

 *ज़मीर की ललकार* 


धड़क-धड़क जो दे रहा दिल की वो पुकार सुन 

नौजवान तू ज़रा अपने ज़मीर की ललकार सुन


 खौफ में क्यों जी रहा खुलके सामने तो आ 

मौत से टकराएगा तो जिंदगी को पाएगा 


कायरता से जीना तो मौत से बुरा कहीं

गलत को देख चुप रहा इससे बुरा तो कुछ नहीं 


जो हक़ है बात वो कहो सही के साथ तुम रहो 

ना खौफ से तुम डरो बातिल के आगे ना झुको 


धड़क-धड़क जो दे रही दिल की वो पुकार सुन 

नौजवान तू ज़रा अपने ज़मीर की ललकार सुन 


हमको जो लड़ा रहा वो देश का गद्दार है 

आसतीनों में छुपा हुआ दुश्मन का दलाल है


देख उसको गौर से वो हमें ही शामिल कहीं 

जो हमको भड़का रहा अपने भाई से लड़ा रहा 


क्या धर्म कोई सिखाता है नफरतों को पालना 

है किस ग्रंथ में लिखा बेकसूर को मारना 


झूठ फरेब और धोखे को अपनी फितरत ना बनाइए 

सच्चाई की राह पर चलिए औरों को चलाइए 


धड़क-धड़क जो दे रही दिल की वो पुकार सुन 

नौजवान तू ज़रा अपने ज़मीर की ललकार सुन

                                🖋️...... फरहाना....





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