बेअसत

 बेअसत


जब स्याह अंधेरा फैला था 

हर और जुल्मत का पहरा था 

जब जालिम पूजे जाते थे 

और गरीब लुटे जाते थे 

जब औरत की ना कोई इज्जत थी 

बस मर्दों की ही वुकअत थी 

जब बाप इज्जत की खातिर 

अपनी बेटी को जिंदा दफनाता 

जब गरीब और लाचारओं की 

कोई मदद को ना आता 

जब गुलाम की जान का हक भी

उसके मालिक के हाथ में होता था

जब झूठ ,डकैत और धोखेबाजी

इंसान का जौहर कहलाता 

हर ओर अंधेरा छाया था 

हर ओर तबाही फैली थी 

तब रेगिस्तान के एक गलियारे में 

एक मर्दे मोमिन आया था 

गुलाम, गरीब और बेबस को 

अपने सीने से लगाया था 

अमीर गरीब का भेदभाव 

जिसने जड़ से मिटाया था 

गुलाम हफसी को भी जिसने 

तख्त पर बिठाया था 

औरत को इज्जत देकर जिसने 

घर की मलिका बनवाया था 

बेटी की आमद को जिसने 

रब की रहमत करवाया था 

हर बुराई जिसके आने से 

खत्म हुई जमाने से 

वह मर्दे मोमिन मेरा रहबर है 

इस दुनिया का पैगंबर है 

इस दुनिया का पैगंबर है

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