प्रकृतिक को सहेजो
*प्रकृति को सहेजो*
आज जागरूक न हुए तो कल पछताओगे
अपनी बेबसी से कैसे निकल पाओगे
प्रदूषण तेजी से फैलता जा रहा हर तरफ
हवा में जहर सांस लेना भी दुर्लभ है अब
ना सग खाना रहेगा ना पानी कोई
तो जिंदगी में भी ना होगी रवानी कोई
इन्हें जानो और सोचो विस्तार में
प्रकृति को सहेजो तुम हर हाल में
आज पानी नहीं सूखी पड़ी है ज़मीं
क्या नजर नहीं आती अपनी कमी
ईट के जंगल ही हर तरफ नजर आते हैं
उन हरियाली की जगह हम इन्हें खड़ा पाते हैं
रोज नई परेशानी से हम टकराते हैं
फिर भी चिंता ना इसकी हम कर पाते हैं
आज सजग न हुए तो
भविष्य डूब जाएगा अंधकार में
प्रकृतिक को सहेजो तुम हर हाल में
ये नदियां ,ये पर्वत , ये जंगल, पवन
इनसे मिलकर बना है हमारा ये तन
इनके बिना एक पल भी ना जी पाएंगे
साथ इनके ही हम उन्नति पाएंगे
इन्हें संजोओ, सवारों मिलकर सब साथ में
प्रकृतिक को सहेजो तुम हर हाल में
🖋️..... फरहाना
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