दिल के क़रीब हो तो

 *दिल के क़रीब हो तुम* 


दूर रहते हो मगर मेरे दिल के क़रीब हो तुम 

अजनबी नहीं मेरे मोहसिन अजीब हो तुम


रात की तन्हाई में भी तेरी यादें मेरे पहलू से लगी बैठी है

क्या बताऊं ऐ दोस्त इस दिल के रक़ीब हो तुम


है कुछ बात तुम में जो मैं यूं मर मिटा तुम पे 

भोले दिखते हो पर शातिर शदिद हो तुम


भला जानो बुरा जानो तुम्हारी अपनी मर्जी है 

मुझे तो इश्क तुमसे मेरे आंखों की ईद हो तुम


मुझे तो इश्क की बीमारी ने बदहाल कर डाला

अब तो तुम दवा मेरे और तबीब भी हो तुम


नहीं कुछ याद मुझको बस तेरे नाम के सिवा 

कुछ बतला भी दो ज़रा मेरे तो रफ़ीक हो तुम


दूर रहते हो मगर मेरे दिल के क़रीब हो तुम 

अजनबी नहीं मेरे मोहसिन अजीब हो तुम

            🖋️...... फरहाना

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