ज़ुल्म का दौर
ज़ुल्म का दौर दौर जुल्म का छटा कहां है गरीबों को हक बटा कहां हैं अब भी ताकत के नशे में चूर ज़्यादतीया करते हैं दौलत फिर दिखला कर अपने करतूतों को ढकते हैं इंसाफ भी घुटने टेक चुका अब सियासी गलियारों में मीडिया भी तो बिक चुकी है दौलत की झनकारो में कुछ बहुत अमीर ताज़िर के हाथों ये सियासत भी बिक जाती है गरीबों का हक मार मार कर जेब उनकी भरवाती हैं हक के लिए जो उठता है उस सर को कुचला जाता है जो आवाज उठाता है उन सब को मसला जाता है कभी डर कभी इज्जत की खातिर गरीब चुप हो जाता है ज़ालिम उनकी कमजोरी से अक्सर खेल जाता है दौर जुल्म का छठा कहां हैं गरीबों को हक बटा कहां है 🖋️.... फरहाना शेख