दर्द
दर्द वो बात तुझ में रही नहीं जो दिल को मेरे दुखा सके अब लगे हैं इस पर पहरे सख्त क्या मजाल कोई अब आ सके बड़ी चोट इसको है लगी भरा दर्द इसने है सहा बड़ी देर से है जाना ये जो मिजाज़ जमाना बदल रहा मैंने महसूस की उन थपेड़ों को रुख़ हवा कब बदला पता नहीं मैं उठ कर वहां से ना जा सकी इस तरह ज़मी मेरी तंग थी हर चोट मैंने सह लिया हर दर्द दिल पर ले लिया मेरी ज़बान फिर भी बंद ही रही 🖋️..... फरहाना मेरा साथ इसने दिया नहीं