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Showing posts from June, 2021

पथिक

*पथिक*  मैं पथिक उम्र भर प्रवास ही मेरा काम है । ज़िंदगी के अंत तक मुझको नहीं विराम है । मैं पथिक उम्र भर प्रवास ही मेरा काम है ।   ऊंचे ऊंचे पर्वतें हो या अरण्य का घेराव । चाह से अपनी पार कर लूं जो भी पथ पर आ पड़ा । सागर की विराटता हो या मरुस्थल की ज्वाला । मेरे पग को रोक न पाया बाधा राह में जो भी मिला । जटिलता कठिनाइयां जीवन में तो आती रही  निराशा और परेशानियां मुझको यू ही घबराती रही निराशा में आशा की राह को तलाशता  पथ की जटिलता को जीवन की सफलता में बदलता चला रात की चांदनी ने मार्गदर्शन मेरा किया । सुबह की ठंडी हवा ने धैर्य बल मुझ को दिया । पक्षियों की चहचहाहट में गीत जीवन के सुने । वसुंधरा के पुष्प ने दिल में उम्मीदें भरे । मैं पथिक उम्र भर प्रवास ही मेरा काम है । ज़िंदगी के अंत तक मुझको नहीं विराम है । मैं पथिक उम्र भर प्रवास ही मेरा काम है । .... 🖋️ फरहाना, चंडीगढ़

नजर

 **नजर**  थी नजर की ख़ता  दिल को सहना पड़ा  बात इतना ही था  और फसाना बना । उसकी नज़रों में थी  बड़ी दिलकश अदा  दिल खुद ब खुद उसका  दीवाना बना । अब नज़र में कोई और  जंचता नहीं  इस दिल में कोई और  बसता नहीं । नज़र से उतरकर  वो रुह में बस गई  उसे ज़िदंगी में बसा लूं  है तमन्ना यही । ... 🖋️ फरहाना, चंडीगढ़

बेअसत

बेअसत जब स्याह अंधेरा फैला था  हर ओर ज़ुल्मत का पहरा था  जब ज़ालिम पूजे जाते थे  और ग़रीब लूटे जाते थे  जब औरत की ना कोई इज्ज़त थी  बस मर्दों की ही वुक़अत थी  जब बाप इज्ज़त की ख़ातिर  अपनी बेटी को ज़िंदा दफनाता  जब ग़रीब और लाचारों की  कोई मदद को ना आता  जब गुलाम की जान का हक़ भी उसके मालिक के हाथ में होता था जब झूठ, डकैत और धोखेबाज़ी इंसान का जौहर कहलाता  हर ओर अंधेरा छाया था  हर ओर तबाही फैली थी  तब रेगिस्तान के एक गलियारे में  एक मर्दे मोमिन आया था  गुलाम, गरीब और बेबस को  अपने सीने से लगाया था  अमीर गरीब का भेदभाव  जिसने जड़ से मिटाया था  गुलाम हब्शी को भी जिसने  तख़्त पर बिठाया था  औरत को इज्ज़त देकर जिसने  घर की मलिका बनवाया था  बेटी की आमद को जिसने  रब की रहमत कहलवाया था  हर बुराई जिसके आने से  ख़त्म हुई जमाने से  वह मर्दे मोमिन मेरा रहबर है  इस दुनिया का पैगंबरﷺ है  इस दुनिया का पैगंबरﷺ है             ...

*रिश्ते*

        *रिश्ते*  बड़े ही खूबसूरत हैं सभी रिश्ते इस जहां के बख्शीश की तरह मिले हैं यह तो हमें आसमां से कहीं मां-बाप की शफक़त कहीं भाई-बहन की मोहब्बत है  कहीं रिश्ते हैं इज्ज़त के कहीं रिश्तों में शरारत है यूं ही अजनबी से भी बना लेते हैं हम रिश्ते फिर उम्र भर सारी  निभा लेते हैं हम रिश्ते बिना रिश्तों के तो जहां में न कोई रौनक है हर रिश्ते इस जहां  के ख़ुदा की तो इनायत है  नहीं तोड़ो इन रिश्तों को बड़ी नाजुक ये डोरी है सहेज कर साथ में रख लो  बड़ी कीमती तिजोरी है  ....🖋️ फरहाना, चंडीगढ़ ...

यादें

        ...यादें... कल भी एक दौर था  आज भी एक दौर है वक्त का यह पहिया  सरकता हर और है  कल नंगे थे पाव थी  माटी की  पगडंडी कहीं धूप की झुलसन  कहीं छांव थी अतरंगी ना ग़म था किसी का  ना कोई भी चिंता मस्ती के दिन थे  जैसे आकाश का परिंदा रूखी सूखी जो मिलती  शौक से वह खाते  थे खेत में कमाते  और ताल में नहाते खेतों की मचान पर  कितने लम्हे बिताए  माटी के घर में  कितने सपने सजाए  हर नुक्कड़ हर गली में  कोई अपना मिल जाता  बड़े प्यार से फिर  वह हाल-चाल पूछ जाता  कम थे पैसे  पर खुशियां थी ज्यादा  हर अजनबी इंसान भी  रिश्तेदार बन जाता  वो शादी ब्याह  वो तीज त्योहारों के दिन  वह जेठ का महीना  वो जाडों के दिन वह गांव की कच्ची स्कूलों में  टपकता बारिश का पानी यह बीते दिनों की मेरी  धूमिल कहानी                      .....  🖋️ फरहाना...