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Showing posts from May, 2022

ज़मीर की ललकार

 *ज़मीर की ललकार*  धड़क-धड़क जो दे रहा दिल की वो पुकार सुन  नौजवान तू ज़रा अपने ज़मीर की ललकार सुन  खौफ में क्यों जी रहा खुलके सामने तो आ  मौत से टकराएगा तो जिंदगी को पाएगा  कायरता से जीना तो मौत से बुरा कहीं गलत को देख चुप रहा इससे बुरा तो कुछ नहीं  जो हक़ है बात वो कहो सही के साथ तुम रहो  ना खौफ से तुम डरो बातिल के आगे ना झुको  धड़क-धड़क जो दे रही दिल की वो पुकार सुन  नौजवान तू ज़रा अपने ज़मीर की ललकार सुन  हमको जो लड़ा रहा वो देश का गद्दार है  आसतीनों में छुपा हुआ दुश्मन का दलाल है देख उसको गौर से वो हमें ही शामिल कहीं  जो हमको भड़का रहा अपने भाई से लड़ा रहा  क्या धर्म कोई सिखाता है नफरतों को पालना  है किस ग्रंथ में लिखा बेकसूर को मारना  झूठ फरेब और धोखे को अपनी फितरत ना बनाइए  सच्चाई की राह पर चलिए औरों को चलाइए  धड़क-धड़क जो दे रही दिल की वो पुकार सुन  नौजवान तू ज़रा अपने ज़मीर की ललकार सुन                             ...

काली बदली

 काली बदली  गर्मी में तप रहा है इंसाफ, काली बदली छाने दो  आने दो आने दो काली बदली छाने दो कूलर पंखे में बैठ बैठ कर, थक गए हैं हम बच्चे  गर्मी में खेलकूद भी ,नहीं लगते हमको अच्छे  गर्मी की इस गर्म हवा से, जान हमारी छुड़ाने दो  आने दो आने दो काली बदली छाने दो सोच सोच कर गुम हो गए ,कब बरखा रानी आएगी  गुमड गुमड कर कब वह हमको, ढोलक की थाप सुनाएगी  ठंडी हवा और बरखा की, फुहार से मन को जरा बहलाने दो  आने दो आने दो काली बदली छाने दो छोटी कश्ती कागज की ,कब पानी में बहाएंगे  अम्मा के हाथों के बने, फिर गरम पकोड़े खाएंगे  और ना हम से दूर रहो बस ,और ना हमको तरसाए  आने दो आने दो काली बदली छाने दो।                                      🖋️.... फरहान....

जवाब तो दो ना

 *जवाब तो दो ना*  नफरत में क्यों जीते हो दिल को साफ करो ना  इंसान हो इंसानियत की बात करो ना नफरत में क्यों जीते हो दिल को साफ करो ना आतिश से जला देते हो गरीबों का झोपड़ा  हिम्मत है तो अमीरों के घर में आग भरो ना  जो लूट के ले जाते हैं सरमाया देश का उसका ज़रा जाकर गिरेबान धरो ना  बुर्के पर पाबंदी कभी शरीयत में मुदाखलत  मसला क्या है तुम्हारा ज़रा खुल के कहो ना  यूं मस्जिदों को तोड़कर साबित क्या कर रहे  जब खुदा एक है तो तलाश क्या रहे  रोज़-रोज़ तुम नए मसले हो बनाते कभी सरकार के कामों का भी बखान करो ना जो हिंदुस्तान में रहकर कर रहा चाइना और पाकिस्तान के लिए मुखबरी  उनके लिए भी जरा दो शब्द कहो ना महंगाई ने तो पहले ही कमर तोड़ रखी है  रोज़गार भी नहीं है यह भी तो बोलो ना  रोज़गार, स्कूल, हस्पताल देना किसका काम है  देश का विकास करना किसका काम है  मुद्दे से हटाने के लिए करना यूं मनमानी  ये जुल्म नहीं तो क्या है जवाब तो दो ना ...🖋️ फरहाना .

चलो अब घर को जाते हैं

 *चलो अब घर को जाते हैं*  अब तो शाम हो गई  चलो अब घर को जाते हैं  जिंदगी तमाम हो गई  चलो अब घर को जाते हैं  पहले थी तवानाइ  आंधी से भी डर ना था  अब तो तेज हवाओं से भी  लरज़ उठता है दिल मेरा  वक्त की धारों पर  उम्र यूं ही कट गई  कश्ती साहिल पर आ गई  चलो अब घर को जाते हैं  कभी ठोकर भी लगती थी  और मुंह के बल भी गिरती थी  खड़ी होती थी फौरन में  खुद ही से मैं संभलती थी  मगर वह वक्त गुजर गया  अब कमजोर हो गई  ठोकर खाने की अब तो  हिम्मत भी खो गई  बालों की स्याही ने भी  अब तो साथ है छोड़ा  सफेदी छा गई अब तो  चलो अब घर को जाते हैं जो कुछ पास है मेरे  अब उसको ही बचाना है  ये वक्त गुजरता जा रहा  वक्त का क्या ठिकाना है  वह भूली बिसरी यादों के  साए मुझको बुलाते हैं  अब तो शाम हो गई  चलो अब घर को जाते हैं।             🖋️....... फरहाना

फरियाद

 *फरियाद*  कहां है कहां वो नमाजी कहां है  वो इमान कहां है वो क़ाज़ी कहां है  वो इंसाफ पर मर मिटने वाला  बेबस और यतीमो की मदद करने वाला  जालिम जहां में उस वक्त भी फैला था जब काबे को ढाने  अब्राहा हाथी देकर चला था  अपने नेक बंदों की दुआ खुदा ने ना ठुकराई  अबाबील के जरिए सारे ज़ालिमो की खुदा ने कर दी सफाई  आज का अब्राहम भी चल पड़ा खुदा के घर को मिटाने  कहां है वो दुआएं जो रब की रहमत बुलाए  चलो मिलकर सब सहाबा की जिंदगी को दोहराएं  वो मिल्लत को लाएं अमन को फैलाएं खुदा की मदद आएगी यकीनन  उससे मांगने के लायक हम बन तो जाएं                  ‌🖋️..... फरहाना

बांटते रहो मधुर मुस्कान

 *बांटते रहो मधुर मुस्कान*  ना करो अपने जीवन को वीरान बांटते रहो मधुर मुस्कान  जीवन का चक्र तो चलता रहेगा  दुख सुख इसमें पलता रहेगा  जीवन से अपनी निराशा मिटाओ सबका करो दिल से सम्मान  बांटते रहो मधुर मुस्कान  राह में गर तुम को तुफ़ान मिले या कभी तुम पर ग़म के बादल घिरे मायुसी ना लाओ दिल में कभी अपनी मेहनत से पालो तुम अपना मुकाम बांटते रहो मधुर मुस्कान निराशा के सभी गिरह को खोलो इसमें आशा के मोती पिरोलो रोज़ सुरज हमें सिखाता येही तेज़ धारा मचलके ये देती पैग़ाम बांटते रहो मधुर मुस्कान            🖋️...... फरहाना