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Showing posts from May, 2021

कालाबाज़ारी

 # *कालाबाज़ारी*  # ऐ इंसान छोड़ दे तू अपनी मक्कारी, क्यूं करता कालाबाज़ारी । धन इकट्ठा करके भी हाथ तेरे क्या आएगा । दुनिया से जब जाएगा खाली हाथ ही जाएगा  । पाप कमा के अपना ही घड़ा भरे तू जाता है । अपनों के तू संग काहे दूरियां बढ़ाता है । एक रोज़ तेरा भी दिन यूं ही ढल जाएगा । करके कालाबाज़ारी हाथ तेरे ना कुछ आएगा । तब पछता के क्या अपना भाग्य बदल तू पाएगा । तेरे पाप का घड़ा तुझ पर ही फूट जाएगा । पाप खिलाकर बच्चों को पुण्य का करता है तू आस । चूस के गरीबों का तू खू़न कितने दिन कर लेगा राज । एक रोज़ विधाता का बुलावा नाम तेरे आ जाएगा । दुनिया को छोड़ तेरा प्राण पखेरू उड़ जाएगा । ऐ इंसान छोड़ दे तू अपनी मक्कारी । क्यूं करता कालाबाजारी । क्यूं करता कालाबाजारी । .....🖋️ फरहाना, चंडीगढ़

आज की हकीकत

 #*आज की हकीकत*# आज है जिंदगी सलामत  अपनों के संग इसे गुजार लो  छोटी बड़ी खुशियों से  अपनी जिंदगी सवार लो  है मोत तो हकीकत एक रोज तो आएगी उसके खौफ में तुम रहकर  ना आज को बिगाड़ लो अभी सांसे चल रही है  अपनी गलतियां सुधारो  जो रूठा तुमसे कोई उसे जाकर तुम मना लो कल वक्त ना रहा तो  अफसोस तुम करोगे आज वक्त है गनीमत इस हकीकत को जान लो किसी की मदद कर सको तो अपने हाथ को बढ़ा लो ये है काम बहुत अच्छा इससे नेकिया कमालो आज है जिंदगी सलामत  अपनों के संग इसे गुजार लो छोटी-बड़ी खुशियों से अपनी जिंदगी सवार लो

एक भिखारी

 # *# *एक भिखारी*  # नजरों में आपके शून्य, निर्गुण, व्यर्थ, अनाड़ी, हां साहेब मैं हूं एक भिखारी । धूप छांव में चलता हूं, गली गली मैं फिरता हूं । हाथ में कटोरा आंख में पानी, बस यही है मेरी ज़िंदगानी । भूखा हूं सबको यह सुनाता हूं, गली-गली सिग्नल सिग्नल चिल्लाता हूं । फिर भी रात को भूखा सो जाता हूं । दया करुणा के भाव से कई लोग मुझको तकते हैं, एक दो पैसे मेरे भी हाथ पे वो रखते हैं । मेरे लिए ना अस्पताल ना दवाई,  मेरे लिए ना बिस्तर ना रजाई ।  फुटपाथ ही मेरा डेरा है यही रैन बसेरा है । सर्दी गर्मी और बरसात मेरे लिए एक से हालात । जीवन का हर पल जो मैं जीता हूं, दिल में लाखों गम मैं पीता हूं । तरसती आंखें हैं, सपने हैं, कुछ अरमान हैं मेरे,  लेकिन क्या वो पूरे हो पाएंगे ?  क्योंकि वो कल्पना और ये सत्य हैं मेरे । ना भूत ना वर्तमान ना कोई भविष्य नजर आता है, एक शून्य में जिए जा रहा हूं मैं । बस यही जीवन का बहीखाता है । नजरों में आपके शून्य, निर्गुण, व्यर्थ, अनाड़ी, हां साहेब मैं हूं एक भिखारी । हां साहेब मैं हूं एक भिखारी । ....🖋️ फरहाना, चंडीगढ़  # नजरों में आपके ...

जुल्म

 # *ज़ुल्म*  # मासूम फिलिस्तीनियों पर ज़्यादतियां करने वाले, अंजाम क्या होगा तेरा ये याद कर लेना कभी । मस्जिद ए अक़्सा में दहशतगर्दीयां करने वाले, अंजाम क्या होगा तेरा ये याद कर लेना कभी । ज़ुल्म जैसा भी हो पल नहीं सकता कभी, दौर जालिम का चल नहीं सकता कभी । इंतजार कर तू अपने अंजाम पर आ जाएगा, ज़ुल्म जो तेरा है सब खाक में मिल जाएगा । सोचता है क्या तेरे पास है ताकत सभी, जिस पे चाहे जुल्म कर ले तुझ को इजाज़त है सभी । दौर क्या फिरऔन का तेरे तसव्वुर से गया, क्या हुआ शद्दाद का है ईल्म इसका तुझको ज़रा । लूत की जो कौम थी कैसे फना वो हो गई, समूद की जो कौम थी किस बेबसी में सो गई । जो इस फ़ानी दुनिया में मगरूर बन कर रहा, तारीख गवाह है ना हो पाया उसका भला । चार दिन की जिंदगी है इस पर इतराता है क्या, मौत जब आएगी तो पूछेंगे तेरा हाल क्या । अब भी तू बाज़ आजा छोड़ दे इस जुल्म को, शायद रहबरी के लिए खुदा भेज दे किसी नूर को । ....🖋️ फरहाना, चंडीगढ़

मेरी उलझन

 # *मेरी उलझन* # आज मेरे पास अजब सी उलझनें आकर खड़ी, सोचती हूं क्या मैं बांटूं आप सबसे इसको थोड़ी । उलझन तो एक है किंतु  एक पर टिकते कहां, सोच का वसी दायरा सोच से झुकते कहां । जबकि एक माचिस भी खुद से बन कभी सकता नहीं, फिर ये दुनिया खुद से बन गई यह तो हो सकता नहीं । हर एक तख़लीक में लाखों करामात हैं छुपे, खुद से ये बन जाए यह तो सोच से भी है परे । रब तो कोई है यकीनन जिसने रचा सारा जहां, हर एक तख़लीक में रख दी हजारों खूबियां । फिर ये क्यूं काफी नहीं उसकी ही इबादत हम करें, वो भला क्यों कर रखेगा खुद पे भी हाकिम खड़े । जबकि उसने हर एक शय  हैं इतनी खूबी से घड़े, उस से बेहतर कौन होगा जिसकी इबादत हम करें । चांद, सूरज, इंसान, जानवर इससे क्यों हम मांगते, जो है इन सब का रचयिता उसको क्यों नहीं हम जानते । कोई भी हाकिम क्या चाहेगा कि उसकी ही प्रजा, दूसरे हाकिम को पूजे  मांगे छोड़कर उसको भला । है जो हाकिम सारे जहां का वो फिर क्यों कर चाहेगा, शरीक करें मखलूक उसकी  साथ उसके औरों को भला । ये है अजब उलझन मेरी जो हल हो किसी के पास में, मुझको भी बतलाओ जरा फंसी हूं मैं जंजाल में । ......

मज़दूर, Mazdoor

 # * मज़दूर * # जीवन में बड़े कठिन समय बिताते हैं,  हम मज़दूर हैं मज़दूरी कर अपना घर चलाते हैं । पेट की खातिर अपनों को छोड़ दूरदराज़ आते हैं, बेगानों के बीच नए रिश्ते बनाते हैं।  हम मज़दूर हैं मज़दूरी कर अपना घर चलाते हैं  काम की खातिर अपनी जान पर खेल जाते हैं,  दिन-रात मज़दूरी कर नए शाहकार बनाते हैं।  दुनिया में सड़कें मकानात हमारे दम से बनते हैं,  छोटे बड़े कारखाने हमारे दम से चलते हैं।  काम की ख़ातिर कभी बीहड़ जंगल में भी रुकते हैं, कभी पहाड़ों को काट जिंदगी में रफ्तार भरते हैं। कई छोटे-बड़े कामों के लिए हमारी ही ज़रूरत है, जीवन को सुखमय बनाने के लिए हमारी ही ज़रूरत है। हम चलते रहे तो सारा देश चलता है, हम रुक जाएं तो सारा देश ठहरता है। फिर भी हमारी परवाह किसी को कहां होती, हमारे जीवन विकास की चिंता किसी को कहां होती। जीवन में बड़े कठिन समय बिताते हैं, हम मज़दूर हैं मज़दूरी कर अपना घर चलाते हैं। हम मज़दूर हैं मज़दूरी कर अपना घर चलाते हैं। .....🖋️ *फरहाना* , चंडीगढ़