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अल्लाह हू अकबर

 *अल्लाह हू अकबर**  अल्लाह हू अकबर, अल्लाह हू अकबर  नारा है ये मुजाहिदों का, सुन लो ज़माना  ज़ालिम के ज़ुल्मों से नहीं है, हमको घबराना  जब तक की ज़िंदगी है, इस्लाम पर ही जिएंगे  किस्मत में अगर हो तो, जामे शहादत भी पियेंगे  अल्लाह हू अकबर, अल्लाह हू अकबर  इस कौम के लोगों को ना, कमज़ोर समझना  फौलाद हैं हम हमको ना, कुछ और समझना  अपने जुल्मो सितम से हमें, डरा ना सकोगे  लो सर पे कफन बांध ली, तुम क्या ही कर लोगे  अल्लाह हू अकबर, अल्लाह हू अकबर  इस्लाम में मुदाख़लत, बर्दाश्त नहीं है इस दिल में खुदा के सिवा, कोई और नहीं है अमनो सुकूं के साथ हम, रहते हैं ज़मीं पर  जुल्म व नफरत नहीं, ज़ेब है हम पर अल्लाह हू अकबर, अल्लाह हू अकबर हुज़ूर ने सिखाया जो, पैग़ाम वही है हर मखलूक के लिए मोहब्बत, ये फरमाने नबी है दादा आदम से शुरू है, तारीख़ हमारी हर दौर में रहेगी ये, शैतानों पे भारी अल्लाह हू अकबर ,अल्लाह हू अकबर ....🖋️ फरहाना, चंडीगढ़

आज का फलस्तीन

 *आज का फलस्तीन*  या रब ज़रा कर दे, अपनी रहमत उन पर बड़ी तकलीफ़ में फंसे हैं, तेरे बंदे फलस्तीनी  कहीं राहत ना मदद है, कैसी मुश्किल की घड़ी है हर तरफ ज़ोर ज़ालिम का, मौत सर पर ही खड़ी है ज़माना देख रहा है, यहां बच्चों की लाशों को फिर भी खामोश हैं सारे ,सबको अपनी ही पड़ी है हुक्मरां बिक गए सारे, ज़मीर ज़िंदा नहीं उनका  फलस्तीनीयों की हालत पर भी, दिल पिघला नहीं जिनका वो बेबसी वो तकलीफ़, जो अयां हो नहीं सकती गुजर रही है जो उनपर, वो बयां हो नहीं सकती ना खाना है ना पानी है , ज़ख्म से चूर हैं सारे मकां ज़ालिम ने डाह दिया , वो घर से दूर हैं सारे बिलखते बच्चे रोती मांऐ, और तड़पते बाप को देखो ऐ राहत में रहने वालो , ये ग़ज़ा के हालात को देखो या अल्लाह बदर के फरिश्तों से, या अबाबील से मदद कर दे ज़ालिम इजराइल से अपने बंदे फलस्तीनीयों कि  मदद कर दे                 🖋️ ..... फरहाना...

बिटिया

 मेरे क़ौम की बेटियों  अपने आप को पहचानो  ईमान है क्या  इसे तो ज़रा जानो जिस दिल को हासिल है  अल्लाह की मोहब्बत  उस दिल को क्यों होगी  किसी और की चाहत  दुनिया को जब ख़ुदा ने  इतना हंसी बनाया  होगा जन्नत का हुस्न कैसा  जिसे रब ने ख़ुद सजाया  किसी के चाहत की ख़ातिर  अल्लाह को भूल जाना  अच्छा नहीं है सुन लो  इमान से दूर जाना अल्लाह को भी मानो  अल्लाह की भी मानो  है शैतान बड़ा दुश्मन  उसके मक्ऱ को पहचानो  दो दिन की ज़िंदगी है  आखिर तो मौत है  नहीं साथ होगा कोई  बस रब का साथ है          🖋️.... फरहाना ...

रब्बे ज़ुलज़लाल

 *रब्बे ज़ुलज़लाल*  कौन सुबह तुलू कर सूरज   डुबोता है शाम को कौन मिट्टी से बना   मिटाता इंसान को है किसका नूर फैला  आसमां में चार सु किसकी क़ुदरतो से  गुलों में है रंगो बू है कौन जो जहां को  चलाता ही जा रहा सितारों को आसमां में  फैलाता ही जा रहा किसने समंदर में  मोती बना दिया ज़मीं को चीर किसने गल्ला उगा दिया है किसके इल्म की  नहीं कोई इंतेहा है किसके कब्जे़ में  ये ज़मीन ओ आसमां वह एक ही जो सबका  खालिक है मालिक भी वो एक जिसका कोई भी  शरीक ही नहीं वो अल्लाह है अल्लाह है अल्लाह ही तो है  तेरा मेरा सब का वो रब्बे ज़ुलज़लाल                   ...🖋️ फरहाना ...

मैं तेरा उम्मती

 *मैं तेरा उम्मती*  ए खुदा के मेरे  महबूब ए रसूल तुझ को मेरा सलाम  मैं हूं तुझ पे कुर्बान  तू मेरा है नबी  मैं तेरा उम्मती मैं तेरा उम्मती  मैं तेरा उम्मती ये तो दुनिया  अंधेरों में डूबी थी बस हर तरफ जुल्म का दौड़ दौरा ही था बुत खुदा बन गए कुफ्र पलने लगा दुनिया से इंसाफ  जेसे मरने लगा  कहीं जुल्मों सितम कहीं थी सिसकियां  कहीं इंसानियत की  उठ रही थी आरथियां कोई बेबस बड़ा  कोई बेखौफ था  हर तरफ जुल्म का  एक अजब दौर था  आप की आमद से  हर शय बदलने लगी दिल में इंसानियत  फिर चमकने लगी  जिसने देखा  वो शैदा हुआ आप पर  ककंरो पत्थरों  ने भी कलमा पढ़ा ए खुदा के मेरे  महबूब ए रसूल  तुझ को मेरा सलाम  मैं हूं तुझ पर कुर्बान  तू मेरा है नबी  मैं तेरा उम्मती  मैं तेरा उम्मती  मैं तेरा उम्मती      🖋️ फरहाना

Manzil

 *मंज़िल*  कितनी बार मुझको तुम, रौंदोगे ठुकराओगे.... कब तलक ऐ मेरी मंजिल, दूर मुझसे जाओगे.... रोज़ ही मैं सोचती हूं, क्यों ये धोखे खा रही हूं .... आखिर अपने प्यास को, क्यों मिटा नहीं पा रही हूं .... क्या एक चींटी से भी, कमजोर मेरा आत्मबल है ..... या फिर हारने के, डर से मैं घबरा रही हूं..... मेरे अपनों की मुझ पर, है उम्मीदें बड़ी... इसलिए अपनी काबिलियत को, घिस घिस चमका रही हूं .... रह जाएगी एक खलिश, जो पा न सकी मैं तुझको तो ..... फिर मैं अपनी आस की ये, लौ को क्यों बुझा रही हूं ..... छोड़ हर निराशाओं को, फिर हुई तैयार मैं....  ऐ मेरी मंजिल मैं तुझको, पाने आ रही हूं....                        🖋️...... फरहाना....

यही प्यार है

 ना देखूं तो चैन ना मिलता करार है  कोई बताए क्या होता  यही प्यार है  बगिया के फूलों पर  जब आती बाहर है  भंवरा क्यों मदहोश  मंडराता बेकरार है  दिल की लगी को  जब मिलती आवाज है  तब है मोहब्बत  या सिर्फ इकरार है  कोई बताए क्या होता  यही प्यार है          🖋️...... फरहाना