मेरी उलझन

 # *मेरी उलझन* #

आज मेरे पास अजब सी उलझनें आकर खड़ी,

सोचती हूं क्या मैं बांटूं आप सबसे इसको थोड़ी ।

उलझन तो एक है किंतु  एक पर टिकते कहां,

सोच का वसी दायरा सोच से झुकते कहां ।

जबकि एक माचिस भी खुद से बन कभी सकता नहीं,

फिर ये दुनिया खुद से बन गई यह तो हो सकता नहीं ।

हर एक तख़लीक में लाखों करामात हैं छुपे,

खुद से ये बन जाए यह तो सोच से भी है परे ।

रब तो कोई है यकीनन जिसने रचा सारा जहां,

हर एक तख़लीक में रख दी हजारों खूबियां ।

फिर ये क्यूं काफी नहीं उसकी ही इबादत हम करें,

वो भला क्यों कर रखेगा खुद पे भी हाकिम खड़े ।

जबकि उसने हर एक शय  हैं इतनी खूबी से घड़े,

उस से बेहतर कौन होगा जिसकी इबादत हम करें ।

चांद, सूरज, इंसान, जानवर इससे क्यों हम मांगते,

जो है इन सब का रचयिता उसको क्यों नहीं हम जानते ।

कोई भी हाकिम क्या चाहेगा कि उसकी ही प्रजा,

दूसरे हाकिम को पूजे  मांगे छोड़कर उसको भला ।

है जो हाकिम सारे जहां का वो फिर क्यों कर चाहेगा,

शरीक करें मखलूक उसकी  साथ उसके औरों को भला ।

ये है अजब उलझन मेरी जो हल हो किसी के पास में,

मुझको भी बतलाओ जरा फंसी हूं मैं जंजाल में ।

......🖋️ *फरहाना* , चंडीगढ़

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