रब्बे ज़ुलज़लाल

 *रब्बे ज़ुलज़लाल* 


कौन सुबह तुलू कर सूरज  

डुबोता है शाम को


कौन मिट्टी से बना  

मिटाता इंसान को


है किसका नूर फैला 

आसमां में चार सु


किसकी क़ुदरतो से 

गुलों में है रंगो बू


है कौन जो जहां को 

चलाता ही जा रहा


सितारों को आसमां में 

फैलाता ही जा रहा


किसने समंदर में 

मोती बना दिया


ज़मीं को चीर किसने

गल्ला उगा दिया


है किसके इल्म की 

नहीं कोई इंतेहा


है किसके कब्जे़ में 

ये ज़मीन ओ आसमां


वह एक ही जो सबका 

खालिक है मालिक भी


वो एक जिसका कोई भी 

शरीक ही नहीं


वो अल्लाह है अल्लाह है अल्लाह ही तो है 

तेरा मेरा सब का वो रब्बे ज़ुलज़लाल


                  ...🖋️ फरहाना ...

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