कालाबाज़ारी
# *कालाबाज़ारी* #
ऐ इंसान छोड़ दे तू अपनी मक्कारी, क्यूं करता कालाबाज़ारी ।
धन इकट्ठा करके भी हाथ तेरे क्या आएगा ।
दुनिया से जब जाएगा खाली हाथ ही जाएगा ।
पाप कमा के अपना ही घड़ा भरे तू जाता है ।
अपनों के तू संग काहे दूरियां बढ़ाता है ।
एक रोज़ तेरा भी दिन यूं ही ढल जाएगा ।
करके कालाबाज़ारी हाथ तेरे ना कुछ आएगा ।
तब पछता के क्या अपना भाग्य बदल तू पाएगा ।
तेरे पाप का घड़ा तुझ पर ही फूट जाएगा ।
पाप खिलाकर बच्चों को पुण्य का करता है तू आस ।
चूस के गरीबों का तू खू़न कितने दिन कर लेगा राज ।
एक रोज़ विधाता का बुलावा नाम तेरे आ जाएगा ।
दुनिया को छोड़ तेरा प्राण पखेरू उड़ जाएगा ।
ऐ इंसान छोड़ दे तू अपनी मक्कारी ।
क्यूं करता कालाबाजारी ।
क्यूं करता कालाबाजारी ।
.....🖋️ फरहाना, चंडीगढ़
Really it is a true lines
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