यादें
...यादें...
कल भी एक दौर था
आज भी एक दौर है
वक्त का यह पहिया
सरकता हर और है
कल नंगे थे पाव थी
माटी की पगडंडी
कहीं धूप की झुलसन
कहीं छांव थी अतरंगी
ना ग़म था किसी का
ना कोई भी चिंता
मस्ती के दिन थे
जैसे आकाश का परिंदा
रूखी सूखी जो मिलती
शौक से वह खाते
थे खेत में कमाते
और ताल में नहाते
खेतों की मचान पर
कितने लम्हे बिताए
माटी के घर में
कितने सपने सजाए
हर नुक्कड़ हर गली में
कोई अपना मिल जाता
बड़े प्यार से फिर
वह हाल-चाल पूछ जाता
कम थे पैसे
पर खुशियां थी ज्यादा
हर अजनबी इंसान भी
रिश्तेदार बन जाता
वो शादी ब्याह
वो तीज त्योहारों के दिन
वह जेठ का महीना
वो जाडों के दिन
वह गांव की कच्ची स्कूलों में
टपकता बारिश का पानी
यह बीते दिनों की मेरी
धूमिल कहानी
..... 🖋️ फरहाना...
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