बेअसत

बेअसत


जब स्याह अंधेरा फैला था 

हर ओर ज़ुल्मत का पहरा था 

जब ज़ालिम पूजे जाते थे 

और ग़रीब लूटे जाते थे 

जब औरत की ना कोई इज्ज़त थी 

बस मर्दों की ही वुक़अत थी 

जब बाप इज्ज़त की ख़ातिर 

अपनी बेटी को ज़िंदा दफनाता 

जब ग़रीब और लाचारों की 

कोई मदद को ना आता 

जब गुलाम की जान का हक़ भी

उसके मालिक के हाथ में होता था

जब झूठ, डकैत और धोखेबाज़ी

इंसान का जौहर कहलाता 

हर ओर अंधेरा छाया था 

हर ओर तबाही फैली थी 

तब रेगिस्तान के एक गलियारे में 

एक मर्दे मोमिन आया था 

गुलाम, गरीब और बेबस को 

अपने सीने से लगाया था 

अमीर गरीब का भेदभाव 

जिसने जड़ से मिटाया था 

गुलाम हब्शी को भी जिसने 

तख़्त पर बिठाया था 

औरत को इज्ज़त देकर जिसने 

घर की मलिका बनवाया था 

बेटी की आमद को जिसने 

रब की रहमत कहलवाया था 

हर बुराई जिसके आने से 

ख़त्म हुई जमाने से 

वह मर्दे मोमिन मेरा रहबर है 

इस दुनिया का पैगंबरﷺ है 

इस दुनिया का पैगंबरﷺ है 

           ...... 🖋️ फ़रहाना 

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