पथिक

*पथिक* 

मैं पथिक उम्र भर प्रवास ही मेरा काम है ।

ज़िंदगी के अंत तक मुझको नहीं विराम है ।


मैं पथिक उम्र भर प्रवास ही मेरा काम है ।

 

ऊंचे ऊंचे पर्वतें हो या अरण्य का घेराव ।

चाह से अपनी पार कर लूं जो भी पथ पर आ पड़ा ।


सागर की विराटता हो या मरुस्थल की ज्वाला ।

मेरे पग को रोक न पाया बाधा राह में जो भी मिला ।


जटिलता कठिनाइयां जीवन में तो आती रही 

निराशा और परेशानियां मुझको यू ही घबराती रही


निराशा में आशा की राह को तलाशता

 पथ की जटिलता को जीवन की सफलता में बदलता चला


रात की चांदनी ने मार्गदर्शन मेरा किया ।

सुबह की ठंडी हवा ने धैर्य बल मुझ को दिया ।


पक्षियों की चहचहाहट में गीत जीवन के सुने ।

वसुंधरा के पुष्प ने दिल में उम्मीदें भरे ।


मैं पथिक उम्र भर प्रवास ही मेरा काम है ।

ज़िंदगी के अंत तक मुझको नहीं विराम है ।


मैं पथिक उम्र भर प्रवास ही मेरा काम है ।


.... 🖋️ फरहाना, चंडीगढ़

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