चलो अब घर को जाते हैं
*चलो अब घर को जाते हैं*
अब तो शाम हो गई
चलो अब घर को जाते हैं
जिंदगी तमाम हो गई
चलो अब घर को जाते हैं
पहले थी तवानाइ
आंधी से भी डर ना था
अब तो तेज हवाओं से भी
लरज़ उठता है दिल मेरा
वक्त की धारों पर
उम्र यूं ही कट गई
कश्ती साहिल पर आ गई
चलो अब घर को जाते हैं
कभी ठोकर भी लगती थी
और मुंह के बल भी गिरती थी
खड़ी होती थी फौरन में
खुद ही से मैं संभलती थी
मगर वह वक्त गुजर गया
अब कमजोर हो गई
ठोकर खाने की अब तो
हिम्मत भी खो गई
बालों की स्याही ने भी
अब तो साथ है छोड़ा
सफेदी छा गई अब तो
चलो अब घर को जाते हैं
जो कुछ पास है मेरे
अब उसको ही बचाना है
ये वक्त गुजरता जा रहा
वक्त का क्या ठिकाना है
वह भूली बिसरी यादों के
साए मुझको बुलाते हैं
अब तो शाम हो गई
चलो अब घर को जाते हैं।
🖋️....... फरहाना
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