Manzil
*मंज़िल*
कितनी बार मुझको तुम, रौंदोगे ठुकराओगे....
कब तलक ऐ मेरी मंजिल, दूर मुझसे जाओगे....
रोज़ ही मैं सोचती हूं, क्यों ये धोखे खा रही हूं ....
आखिर अपने प्यास को, क्यों मिटा नहीं पा रही हूं ....
क्या एक चींटी से भी, कमजोर मेरा आत्मबल है .....
या फिर हारने के, डर से मैं घबरा रही हूं.....
मेरे अपनों की मुझ पर, है उम्मीदें बड़ी...
इसलिए अपनी काबिलियत को, घिस घिस चमका रही हूं ....
रह जाएगी एक खलिश, जो पा न सकी मैं तुझको तो .....
फिर मैं अपनी आस की ये, लौ को क्यों बुझा रही हूं .....
छोड़ हर निराशाओं को, फिर हुई तैयार मैं....
ऐ मेरी मंजिल मैं तुझको, पाने आ रही हूं....
🖋️...... फरहाना....
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